मध्यप्रदेश में रिकॉर्ड उपार्जन ने बदली राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा की तस्वीर
सुधीर गोरे
भोपाल। कभी देश की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का केंद्र माने जाने वाले पंजाब और हरियाणा के बीच अब मध्यप्रदेश तेजी से एक नई पहचान बना रहा है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर गेहूं खरीदी में मध्यप्रदेश ने इस वर्ष नया इतिहास रचते हुए 103 लाख 48 हजार मीट्रिक टन से अधिक गेहूं का उपार्जन कर देश में अग्रणी स्थान हासिल किया है। राज्य सरकार के अनुसार अब तक 13 लाख 36 हजार किसानों से गेहूं खरीदा जा चुका है, जिनमें 8 लाख 9 हजार 990 सीमांत और लघु किसान शामिल हैं।
यह उपलब्धि केवल एक सरकारी आँकड़ा नहीं, बल्कि भारत की बदलती कृषि अर्थव्यवस्था, ग्रामीण नकदी प्रवाह, प्रशासनिक प्रबंधन और खाद्य सुरक्षा के नए भूगोल की कहानी भी है।
मध्यप्रदेश क्यों बन रहा है देश का नया “ग्रेन पावरहाउस”?
पिछले एक दशक में मध्यप्रदेश ने गेहूं उत्पादन और सरकारी खरीदी दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि सिंचाई क्षमता में वृद्धि, आधुनिक बीजों का उपयोग, बेहतर सड़क और मंडी नेटवर्क तथा किसानों के बीच MSP व्यवस्था पर बढ़ते भरोसे ने राज्य को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया है।
एक समय देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली मुख्यतः पंजाब और हरियाणा के गेहूं पर निर्भर थी, लेकिन अब मध्यप्रदेश राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में केंद्रीय भूमिका निभाता दिखाई दे रहा है।
खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री गोविंद सिंह राजपूत के अनुसार कोविड-19 अवधि को छोड़ दें तो पिछले दस वर्षों में यह सबसे बड़ा गेहूं उपार्जन है। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के प्रयासों से केंद्र सरकार ने प्रदेश का खरीदी लक्ष्य 78 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 100 लाख मीट्रिक टन किया था, जिसे राज्य ने पार कर लिया।
रिकॉर्ड खरीदी के पीछे क्या हैं प्रमुख कारण?
विशेषज्ञों के अनुसार इस वर्ष रिकॉर्ड खरीदी के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण रहे:
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अनुकूल मौसम और बेहतर उत्पादन
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MSP के साथ राज्य सरकार का बोनस
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डिजिटल स्लॉट बुकिंग व्यवस्था
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भुगतान प्रक्रिया में तेजी
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खरीदी केंद्रों पर बेहतर प्रबंधन
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किसानों का निजी व्यापारियों की तुलना में सरकारी व्यवस्था पर बढ़ता भरोसा
राज्य सरकार किसानों से 2,585 रुपये प्रति क्विंटल MSP तथा 40 रुपये प्रति क्विंटल बोनस सहित कुल 2,625 रुपये प्रति क्विंटल की दर से गेहूं खरीद रही है। यह दर कई निजी व्यापारिक मंडियों से अधिक होने के कारण किसानों का झुकाव सरकारी खरीदी केंद्रों की ओर बढ़ा।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पहुँचे 22 हजार करोड़ रुपये से अधिक
सरकार के अनुसार किसानों को अब तक 22,842.9 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया जा चुका है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार इतनी बड़ी राशि का सीधे ग्रामीण क्षेत्रों में पहुँचना स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा प्रोत्साहन माना जाता है।
इसका प्रभाव:
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कृषि उपकरणों की बिक्री,
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खाद-बीज बाजार,
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ग्रामीण उपभोक्ता खर्च,
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छोटे व्यापार,
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ट्रैक्टर और वाहन बाजार
पर भी दिखाई दे सकता है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह बढ़ने से स्थानीय बाजारों में आर्थिक गतिविधियाँ तेज होने की संभावना है।
छोटे किसानों को सबसे बड़ा सहारा
इस खरीदी अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि 8 लाख से अधिक सीमांत एवं लघु किसानों ने MSP व्यवस्था का लाभ उठाया। छोटे किसानों के लिए सरकारी खरीदी व्यवस्था कई मायनों में सुरक्षा कवच का काम करती है, क्योंकि निजी बाजार में उन्हें अक्सर कम कीमतों का सामना करना पड़ता है।
कृषि विश्लेषकों का मानना है कि यदि MSP व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ छोटे किसानों तक पहुँचता है, तो इससे ग्रामीण असमानता कम करने में भी मदद मिल सकती है।
मुख्यमंत्री की निगरानी और प्रशासनिक मॉडल
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा खरीदी व्यवस्था की लगातार मॉनिटरिंग को भी इस सफलता का महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। उन्होंने कई खरीदी केंद्रों का औचक निरीक्षण कर तौल व्यवस्था, बारदाने की उपलब्धता और किसानों के लिए जरूरी सुविधाओं की समीक्षा की।
सरकार ने:
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प्रत्येक केंद्र पर तौल कांटों की संख्या 4 से बढ़ाकर 6 की,
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तौल पर्ची जारी करने का समय रात 10 बजे तक बढ़ाया,
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भुगतान प्रक्रिया रात 12 बजे तक चालू रखने के निर्देश दिए,
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जिला प्रशासन को स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने के अधिकार दिए।
यह मॉडल प्रशासनिक विकेंद्रीकरण और रियल-टाइम मॉनिटरिंग का उदाहरण माना जा रहा है।
खरीदी केंद्रों पर सुविधाओं में सुधार
सरकार का दावा है कि किसानों की सुविधा के लिए खरीदी केंद्रों पर:
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पीने का पानी,
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छायादार बैठने की व्यवस्था,
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बारदाना,
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सिलाई मशीन,
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गुणवत्ता परीक्षण उपकरण,
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हम्माल-तुलावटी,
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कंप्यूटर,
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साफ-सफाई के उपकरण
की पर्याप्त व्यवस्था की गई।
इसके साथ ही सप्ताह में छह दिन खरीदी जारी रखी गई ताकि किसानों को लंबा इंतजार न करना पड़े।
लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं
रिकॉर्ड खरीदी के साथ नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि:
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इतने बड़े स्तर पर भंडारण क्षमता,
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वेयरहाउस प्रबंधन,
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परिवहन व्यवस्था,
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मानसून से पहले सुरक्षित स्टोरेज
राज्य एजेंसियों और भारतीय खाद्य निगम (FCI) के लिए बड़ी परीक्षा होगी।
यदि लॉजिस्टिक्स और भंडारण में चूक हुई तो अनाज की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
क्या मध्यप्रदेश बनेगा भारत का “ग्रेन कैपिटल”?
मध्यप्रदेश की बढ़ती हिस्सेदारी अब केवल राज्य की उपलब्धि नहीं रह गई है, बल्कि यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के नए शक्ति-संतुलन की ओर संकेत करती है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रफ्तार बनी रही तो आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश देश का सबसे प्रभावशाली “ग्रेन कैपिटल” बन सकता है।
हालाँकि इसके साथ यह चुनौती भी होगी कि राज्य गेहूं और धान जैसी पारंपरिक फसलों के साथ फसल विविधीकरण को भी संतुलित रखे, ताकि जल संसाधनों और कृषि अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक दबाव न बढ़े।
स्पष्ट है कि इस वर्ष का रिकॉर्ड गेहूं उपार्जन केवल उत्पादन या खरीदी का आँकड़ा नहीं, बल्कि बदलते भारत की कृषि राजनीति, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक क्षमता का एक बड़ा संकेतक बनकर सामने आया है।


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