पलवल में बच्ची से दरिंदगी का मामला, अदालत ने दोषी की सजा पर सुनाया फैसला
पलवल। सात साल की उम्र पूरी होने से महज 17 दिन पहले एक मासूम बच्ची के साथ हुए जघन्य दुष्कर्म और हत्या के मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोषी की दोषसिद्धि को तो बरकरार रखा है, लेकिन उसकी फांसी की सजा (सजा-ए-मौत) को बदलते हुए बिना किसी कानूनी छूट के 50 वर्ष के वास्तविक कड़े आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया है।
मासूम को बहला-फुसलाकर खेतों में ले गया था दोषी और की थी हत्या
यह खौफनाक और दिल दहला देने वाली वारदात 24 मई 2021 को पलवल इलाके में घटित हुई थी। उस दिन सात साल से भी कम उम्र की मासूम बच्ची के माता-पिता जब अपने काम पर गए हुए थे, तब आरोपी आनंद सिंह बच्ची को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया। वह उसे सूनसान खेतों में ले गया जहां उसने मासूम के साथ दरिंदगी की और पोल खुलने के डर से गला दबाकर उसकी बेरहमी से हत्या कर दी। इसके बाद उसने साक्ष्य मिटाने के उद्देश्य से बच्ची के शव को एक गड्ढे में छिपा दिया था, जिसके बाद पलवल की निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने उसे दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट ने पुलिस जांच, अभियोजक और ट्रायल कोर्ट की कमियों पर जताई नाराजगी
दोषी की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने दुष्कर्म, हत्या, अपहरण और सबूत मिटाने के आरोपों में उसकी दोषसिद्धि को पूरी तरह सही माना। इसके साथ ही माननीय अदालत ने पुलिस जांच के दौरान दस्तावेजों में की गई गड़बड़ियों, लोक अभियोजक (सरकारी वकील) की गंभीर लापरवाही और ट्रायल कोर्ट की कमियों पर बेहद तल्ख और कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में हर मुकदमा एक जहाज की तरह होता है जिसे सुरक्षित किनारे तक पहुंचना होता है, और जब हालात मुश्किल हों तो ट्रायल जज को उस जहाज को संभालने वाले कप्तान की तरह मुस्तैद रहना चाहिए।
कपड़ों की पहचान न कराना अभियोजन पक्ष की बड़ी विफलता
अदालत ने सुनवाई के दौरान इस बात पर गहरी चिंता और नाराजगी जताई कि मामले से जुड़े अहम साक्ष्य यानी पीड़िता के कपड़ों की पहचान तक नहीं कराई गई। खंडपीठ ने इस चूक को लोक अभियोजक और ट्रायल कोर्ट की एक बहुत बड़ी विफलता करार दिया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह केवल जांच एजेंसी की लापरवाही नहीं है, बल्कि यह अभियोजन पक्ष और मामले को देखने वाले दोनों ट्रायल जजों की सामूहिक विफलता को दर्शाता है, जिसके कारण न्याय प्रक्रिया की बारीकियों की अनदेखी हुई।
भारी-भरकम जुर्माना लगाने के साथ न्याय सुनिश्चित करने का संदेश
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में न्यायाधीशों के मूल कर्तव्यों को याद दिलाते हुए कहा कि अदालत का काम यह सुनिश्चित करना है कि कोई निर्दोष सजा न पाए और कोई असली दोषी कानून के शिकंजे से बच न सके। दोषी आनंद सिंह की फांसी को 50 साल की वास्तविक कैद में बदलने के साथ ही अदालत ने उस पर भारी जुर्माना भी लगाया है। हत्या के मामले में 50 लाख रुपये और पॉक्सो एक्ट के तहत 23 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है, जिसे वसूल करने के बाद पूरी राशि पीड़ित परिवार को मुआवजे के तौर पर सौंपी जाएगी।


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