विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश की मंजूरी, चीन से आया निवेश सिर्फ एक करोड़ रुपये
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान चीन से प्राप्त प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के केवल एक प्रस्ताव को अपनी स्वीकृति दी है, जिसकी कुल राशि मात्र एक करोड़ रुपये दर्ज की गई है। इसके विपरीत हांगकांग से आए 13 विभिन्न निवेश प्रस्तावों को हरी झंडी दिखाई गई, जिनका कुल मूल्य 610.42 करोड़ रुपये रहा। उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2025 से मार्च 2026 की अवधि के दौरान कुल 63 एफडीआई प्रस्तावों को मंजूरी प्रदान की गई, जिनके माध्यम से देश में 10,292.67 करोड़ रुपये यानी लगभग 1.18 अरब डॉलर का कुल विदेशी निवेश आया। इस समयावधि में वित्तीय मूल्य के दृष्टिकोण से सिंगापुर भारत में सबसे बड़ा निवेशक बनकर उभरा है, जिसके 3,259.88 करोड़ रुपये के पांच बड़े प्रस्तावों को स्वीकृत किया गया।
अप्रैल 2000 से 2026 तक भारत के कुल विदेशी निवेश में चीन का योगदान मात्र 0.32 प्रतिशत दर्ज
सरकारी आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि चीन से आने वाले विदेशी निवेश में पिछले कुछ वर्षों से लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। इससे पूर्व वित्त वर्ष 2024-25 में भी भारत सरकार ने चीन के केवल एक निवेश प्रस्ताव को मंजूरी दी थी, जिसका मूल्य 28.71 करोड़ रुपये था। दीर्घकालिक आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2000 से लेकर मार्च 2026 के बीच भारत में आए संपूर्ण विदेशी प्रत्यक्ष निवेश में चीन की कुल हिस्सेदारी महज 0.32 प्रतिशत रही है। इस पूरी अवधि में चीन से कुल 2.51 अरब डॉलर (लगभग 16,162 करोड़ रुपये) का निवेश भारत आया और वह भारत के निवेशक देशों की वैश्विक सूची में 23वें स्थान पर रहा, जबकि हांगकांग 0.62 प्रतिशत हिस्सेदारी और 4.91 अरब डॉलर के साथ 15वें पायदान पर रहा।
गलवान घाटी संघर्ष के बाद प्रेस नोट-3 प्रणाली लागू, पड़ोसी देशों के निवेश पर लागू हुए कड़े नियम
वर्ष 2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुए सैन्य संघर्ष के उपरांत भारत सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए प्रेस नोट-3 प्रणाली की शुरुआत की थी। इसके अंतर्गत चीन सहित भारत की थल सीमाओं से सटे सभी पड़ोसी देशों से आने वाले हर प्रकार के विदेशी निवेश के लिए केंद्र सरकार की पूर्वानुमति लेना अनिवार्य बना दिया गया था। चीन के साथ-साथ पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार और अफगानिस्तान से आने वाले किसी भी व्यावसायिक निवेश प्रस्ताव को इस कड़ी सरकारी जांच प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इस नीतिगत बदलाव का मुख्य उद्देश्य सीमावर्ती देशों के अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप पर अंकुश लगाना और घरेलू बाजार की सुरक्षा सुनिश्चित करना था।
भारतीय कंपनियों के अधिग्रहण को रोकने और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए उठाया गया कदम
प्रेस नोट-3 प्रणाली को प्रभावी बनाने से पूर्व कई क्षेत्रों में विदेशी निवेश विभागीय अथवा राज्य स्तर पर सीधे मंजूर कर लिए जाते थे। सरकार का प्राथमिक उद्देश्य वैश्विक महामारी और आर्थिक अनिश्चितता के दौर में वित्तीय दबाव झेल रही भारतीय कंपनियों के सस्ते दामों पर होने वाले संभावित अधिग्रहणों को रोकना था। इस सख्त निगरानी व्यवस्था के लागू होने के बाद से चीनी कंपनियों के प्रत्यक्ष निवेश प्रस्तावों की अत्यंत बारीकी से जांच की जा रही है। सरकार केवल उन्हीं प्रस्तावों को हरी झंडी दे रही है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के मापदंडों पर पूरी तरह खरे उतरते हैं और जिनसे देश के सामरिक व आर्थिक हितों को किसी भी प्रकार का जोखिम नहीं होता।


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