पीओके में हालात बिगड़े तो मीडिया कवरेज सीमित, पाकिस्तान के कदम से बढ़ी चर्चा
इस्लामाबाद/मुजफ्फराबाद। पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) में जारी उग्र जन-आंदोलन और सुरक्षा बलों की हिंसक कार्रवाई की रिपोर्टिंग को दबाने के लिए शहबाज शरीफ सरकार ने डिजिटल सेंसरशिप का सहारा लिया है। प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना की बर्बरता और जमीनी हकीकत को उजागर करने वाली कई अंतरराष्ट्रीय व क्षेत्रीय डिजिटल समाचार वेबसाइटों तथा प्रसारण माध्यमों तक देश में पहुंच को प्रतिबंधित कर दिया गया है।
सूचना पर नियंत्रण की कोशिश और डिजिटल सेंसरशिप
अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, PoJK में सेना व पुलिस की दमनकारी कार्रवाई और आम जनता के बढ़ते आक्रोश को कवर करने वाले वैश्विक मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अचानक रोक लगा दी गई है। हालांकि, पाकिस्तान सरकार ने इस प्रतिबंध पर अभी तक कोई आधिकारिक सार्वजनिक बयान जारी नहीं किया है।
विश्लेषकों का मानना है कि शहबाज शरीफ सरकार और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर अपने खिलाफ बनते वैश्विक माहौल और सरकारी नैरेटिव के ध्वस्त होने से बौखलाए हुए हैं। पाकिस्तान में मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर यह पहली बार शिकंजा नहीं कसा गया है। इससे पहले भी पाकिस्तान की 'नेशनल साइबर क्राइम इन्वेस्टिगेशन एजेंसी' (NCCIA) की सिफारिशों पर इस्लामाबाद की एक अदालत ने पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान, मुख्य विपक्षी दल और सरकार के आलोचक पत्रकारों के यूट्यूब चैनलों को ब्लॉक करने का आदेश दिया था।
जेएएसी का विरोध और संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप की मांग
इस बीच, PoJK में 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAAC) का आंदोलन उग्र होता जा रहा है। समिति ने हाल ही में कुछ वीडियो फुटेज साझा कर सुरक्षा बलों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। दावों के मुताबिक:
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मुजफ्फराबाद में निहत्थे नागरिकों पर पुलिस व सुरक्षा कर्मियों ने बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज किया।
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प्रदर्शनकारियों को डराने के लिए सादे कपड़ों में मौजूद सुरक्षा कर्मियों ने सीधी गोलीबारी की।
बढ़ते अत्याचारों को देखते हुए JAAC ने संयुक्त राष्ट्र (UN), मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR), एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच और रेड क्रॉस (ICRC) जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से निष्पक्ष जांच कराने और तत्काल हस्तक्षेप करने की अपील की है।
80 तक पहुंची मौतों की संख्या, चुनावी निष्पक्षता पर सवाल
स्थानीय मानवाधिकार संगठनों और क्षेत्रीय रिपोर्टों के हवाले से दावा किया गया है कि मौजूदा अशांति और सुरक्षा बलों की गोलीबारी में अब तक लगभग 80 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें 76 आम नागरिक और चार पुलिसकर्मी शामिल हैं।


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