नई दिल्ली: वर्ष 1981 के एक दोहरे हत्याकांड के मामले में निचली अदालत और उच्च न्यायालय में 44 साल से अधिक समय तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने अहम फैसला सुनाया है। निचली अदालत को इस केस की सुनवाई पूरी करने में 22 साल का समय लगा, वहीं झारखंड हाई कोर्ट ने भी दोषसिद्धि के खिलाफ दायर अपील पर निर्णय देने में 22 साल बिता दिए। इस असाधारण देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरा दुख और चिंता व्यक्त की है।

सुप्रीम कोर्ट ने सजा पर लगाई रोक, रिहाई के आदेश

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने इस अत्यधिक देरी को देश की न्यायिक व्यवस्था की गंभीर विफलता करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने 70 वर्षीय एकमात्र जीवित दोषी की सजा पर रोक लगाते हुए उसे तत्काल प्रभाव से जमानत पर रिहा करने के निर्देश दिए हैं। याचिकाकर्ता फिलहाल अस्वस्थ होने के कारण अस्पताल में भर्ती है, जबकि मुकदमे की इस लंबी अवधि के दौरान पांच अन्य आरोपियों की मौत हो चुकी है।

मामले की होगी उच्च स्तरीय जांच

सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि यह मामला एक ऐसी न्यायिक विफलता का उदाहरण है, जहां चार दशकों से अधिक समय तक चले मुकदमे के कारण आरोपियों को लंबी कानूनी प्रताड़ना सहनी पड़ी। शीर्ष अदालत ने इस बात की विस्तृत जांच करने का भी फैसला किया है कि आखिर ट्रायल कोर्ट और झारखंड हाई कोर्ट में इस मुकदमे का निपटारा होने में इतना लंबा वक्त क्यों लगा, ताकि भविष्य में इस तरह के मामलों की पुनरावृत्ति को रोका जा सके।