सरकारी परियोजनाओं की लागत में 3.40 लाख करोड़ की बढ़ोतरी, आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?
देशभर में क्रियान्वित की जा रही बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर सरकार का भारी-भरकम निवेश जारी है, परंतु इन विकास कार्यों की बढ़ती लागत अब एक गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है। सड़क, रेलवे, ऊर्जा और अन्य प्रमुख क्षेत्रों से जुड़े इन प्रोजेक्ट्स का बजट शुरुआती अनुमानों से काफी आगे निकल चुका है।
लागत में भारी उछाल और आंकड़े
केंद्रीय निगरानी के अंतर्गत संचालित 1775 वृहद इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की कुल अनुमानित लागत में 3.4 लाख करोड़ रुपये की भारी वृद्धि दर्ज की गई है, जिसके चलते यह बढ़कर अब 37.10 लाख करोड़ रुपये हो गई है। इन सभी परियोजनाओं की शुरुआती अनुमानित लागत 33.70 लाख करोड़ रुपये तय की गई थी। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की जुलाई माह की रिपोर्ट के अनुसार, 150 करोड़ रुपये या उससे अधिक लागत वाले इन प्रोजेक्ट्स की मॉनिटरिंग 17 केंद्रीय मंत्रालयों एवं विभागों द्वारा संयुक्त रूप से की जा रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इन सभी परियोजनाओं में सर्वाधिक बड़ी हिस्सेदारी परिवहन यानी ट्रांसपोर्ट सेक्टर की है, जिसमें अकेले 1246 परियोजनाएं शामिल हैं और इनकी कुल लागत लगभग 19.81 लाख करोड़ रुपये आंकी गई है।
आम जनता पर पड़ने वाले प्रभाव
इन महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की लागत बढ़ने के दूरगामी और प्रतिकूल परिणाम देखने को मिल सकते हैं। इस प्रकार की लागत वृद्धि का असर केवल सरकारी राजकोष या बजट तक ही सीमित नहीं रहता है। सड़क, रेलवे, बिजली, जलापूर्ति और शहरी परिवहन जैसे क्षेत्रों में लागत बढ़ने का सीधा अर्थ यह है कि सरकार को निर्धारित कार्यों को समय पर पूरा करने के लिए अपनी जेब से अतिरिक्त राशि खर्च करनी होगी। इससे देश के राजकोषीय बजट पर अनावश्यक दबाव उत्पन्न हो सकता है। इसके अतिरिक्त, निर्माण कार्यों में देरी होने के कारण आम नागरिकों को बेहतर सड़कों, उन्नत रेल सेवाओं और अन्य आधुनिक परिवहन सुविधाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए और अधिक लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है।


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