यश की ‘टॉक्सिक’ में एक्शन का जलवा, मगर कमजोर कहानी और धीमी रफ्तार बनीं परेशानी
मुंबई। चार साल लंबे इंतजार के बाद जब ‘केजिएफ चैप्टर 2’ फेम यश पर्दे पर लौटे, तो फैंस को उम्मीद थी कि सिनेमाघरों में कुछ ऐतिहासिक देखने को मिलेगा। हालांकि, फिल्म देखने के बाद दर्शकों की यह उम्मीदें बिखरती नजर आती हैं। तीन घंटे से ज्यादा लंबी इस फिल्म से बाहर निकलते वक्त जेहन में सिर्फ एक ही सवाल गूंजता है—आखिर निर्देशक कहना क्या चाहती थीं?
कहानी: गोवा, गैंगस्टर और रिश्तों का उलझा ताना-बाना
फिल्म की पटकथा 1940 से 1970 के दशक के गोवा की पृष्ठभूमि पर आधारित है। अपराध, तस्करी और सत्ता के संघर्ष के बीच मुख्य किरदार राया (यश) अपना अंडरवर्ल्ड साम्राज्य स्थापित करता है। इसमें उसके माता-पिता और बहन गंगा (नयनतारा) के साथ उसके भावनात्मक रिश्तों को भी दिखाया गया है। राया की जिंदगी में नादिया (कियारा आडवाणी) की एंट्री होती है, जबकि एलिजाबेथ (हुमा कुरैशी), टोनी (अक्षय ओबेरॉय), रेबेका (तारा सुतारिया) और मेलिसा (रुक्मिणी वसंत) जैसे कई अन्य किरदार इस कहानी का हिस्सा बनते हैं। कागज पर पिता-पुत्र, भाई-बहन, प्रेम, विश्वासघात और सत्ता का यह मिश्रण बेहद दमदार लग रहा था, लेकिन पर्दे पर आते ही गोलियों की आवाज, ग्लैमर और अत्यधिक एक्शन के आगे कहानी कहीं दब कर रह जाती है। फिल्म खुद को 'एक वयस्कों के लिए परी कथा' बताती है, जहां राजकुमार के हाथ में तलवार नहीं बल्कि केवल बंदूक है।
एक्टिंग: यश का जलवा, लेकिन किरदार पड़े पीछे
यश ने इस फिल्म में राया और उनके बेटे रूमी दोनों की दोहरी भूमिकाएं निभाई हैं। उनका स्वैग, चाल-ढाल और स्क्रीन प्रेजेंस जबरदस्त है और प्रशंसकों के लिए सीटियां बजाने के पूरे इंतजाम किए गए हैं। हालांकि, उनके किरदार की भावनाएं और स्थितियां काफी उलझन भरी हैं। वह कभी अत्यधिक गुस्से में नजर आते हैं, तो अगले ही पल आशिक या भाई की भूमिका में दिख जाते हैं। नयनतारा जैसी मंझी हुई अभिनेत्री से गहराई की उम्मीद थी, लेकिन उनका किरदार सिर्फ 'भाई को संभालने' और भारी-भरकम संवाद बोलने तक ही सीमित रह गया है। कियारा आडवाणी को कैमरे ने भरपूर ग्लैमर दिया है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि वह कहानी का हिस्सा कम और फिल्म की ब्रांड एंबेसडर अधिक लग रही हैं।
निर्देशन और पटकथा: आंखों को दावत, दिमाग को सजा
निर्देशक गीतू मोहनदास ने इस फिल्म को बहुत बड़े पैमाने पर बनाने का प्रयास किया है। सर्कस का सेटअप, गोवा का परिवेश, भव्य सेट और शानदार विजुअल्स हर फ्रेम में नजर आते हैं। लेकिन एक निर्देशक की मुख्य जिम्मेदारी केवल भव्यता दिखाना नहीं, बल्कि कहानी को दर्शक तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना भी होती है। यहीं पर फिल्म सबसे ज्यादा मात खाती है। स्टाइलिश शॉट्स और फैशन शूट जैसी भव्यता के बीच मूल कहानी और भावनाएं पूरी तरह गायब हो जाती हैं। एक सीन खत्म होता है और अगला शुरू हो जाता है, जिससे दर्शकों को सोचने या किरदारों से जुड़ने का मौका ही नहीं मिलता।
हिंसा और तकनीकी पक्ष: शानदार सिनेमैटोग्राफी पर भारी पड़ी कमजोर एडिटिंग
फिल्म का एक्शन और हिंसा कई जगहों पर सिर्फ तमाशा बनकर रह जाती है। रवि बसरूर का संगीत इतना तीव्र है कि वह संवाद करने के बजाय दर्शकों पर हावी होता प्रतीत होता है। हालांकि, तकनीकी मोर्चे पर राजीव रवि की सिनेमैटोग्राफी और प्रोडक्शन डिजाइन तारीफ के काबिल हैं। हर फ्रेम महंगा और भव्य नजर आता है, लेकिन बिखरी हुई राइटिंग, कमजोर संवाद और उलझा हुआ स्क्रीनप्ले सब पर भारी पड़ जाता है।


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