रांची। राजधानी के मोरहाबादी मैदान में आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान के बाद झारखंड का सियासी पारा चढ़ गया है। इस बड़े सम्मेलन ने राज्य में जनजातीय अधिकारों, नेतृत्व और सियासी भागीदारी की बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। पूर्व मंत्री बंधु तिर्की के नेतृत्व और कांग्रेस के रणनीतिक सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में जुटी भीड़ से सत्ता पक्ष उत्साहित नजर आ रहा है, जबकि विपक्षी दलों ने इसके वास्तविक स्वरूप पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

मंच पर सत्ता पक्ष की मौजूदगी और विपक्ष के आरोप

रैली के मंच पर कांग्रेस प्रभारी के. राजू समेत पार्टी के कई शीर्ष नेताओं के साथ झामुमो की ओर से विधायक विकास मुंडा भी उपस्थित रहे। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी और कई सामाजिक संगठनों ने इस जुटान को विशुद्ध रूप से कांग्रेस का चुनावी एजेंडा करार दिया है। विपक्ष का आरोप है कि परिसीमन और अधिकारों के नाम पर समाज को भ्रमित किया जा रहा है और विशेष रूप से धर्मांतरित आदिवासी आबादी को लामबंद करने का प्रयास हुआ है।

28 आरक्षित विधानसभा सीटों पर टिकी निगाहें

झारखंड की सियासत में अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित 28 विधानसभा सीटें सत्ता की चाबी मानी जाती हैं:

  • वोट बैंक की जंग: राज्य में सरना और गैर-सरना आदिवासी समुदायों के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर पहले से ही राजनीतिक खींचतान चलती रही है।

  • रणनीतिक बढ़त: कांग्रेस इस बड़े जुटान के जरिए आदिवासी बेल्ट में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पकड़ को मजबूत करने की फिराक में है।

  • सहयोगी और विपक्ष की चुनौती: इस कदम से झामुमो और भाजपा दोनों के लिए अपने पारंपरिक जनजातीय जनाधार को साधे रखने की चुनौती बढ़ सकती है।

चुनावी ध्रुवीकरण और टिकट वितरण पर संभावित असर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह भीड़ चुनावी समर्थन में तब्दील होती है, तो आगामी चुनावों में टिकट बंटवारे से लेकर सीटों के समीकरण तक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अब देखना यह होगा कि मोरहाबादी का यह शक्ति प्रदर्शन केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित रहता है या फिर ईवीएम के जरिए राज्य के चुनावी नतीजों को भी प्रभावित करता है।