Setback for Subhash Chandra from NCLT; sale of assets without permission barred.
राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) की पांच सदस्यीय विशेष पीठ ने एस्सेल समूह के चेयरमैन सुभाष चंद्रा से जुड़े व्यक्तिगत दिवाला मामले में एक बड़ा कदम उठाया है। न्यायाधिकरण ने मामले से जुड़े सभी पक्षों को औपचारिक नोटिस जारी करते हुए सुभाष चंद्रा पर कार्यवाही पूरी होने तक किसी भी प्रकार की संपत्ति की बिक्री या हस्तांतरण पर पूर्ण रोक लगा दी है। इसके साथ ही न्यायाधिकरण ने इस प्रकरण में अपने 25 अगस्त के पूर्व आदेश पर भी अंतरिम रोक लगा दी है।
संपत्तियों के संरक्षण और लेनदारों के हितों की सुरक्षा
न्यायाधिकरण द्वारा यह सख्त निर्देश दिवालिया समाधान प्रक्रिया के दौरान संपत्तियों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से दिया गया है। अदालत का मुख्य ध्येय यह सुनिश्चित करना है कि सुनवाई चलने तक संपत्तियों की स्थिति में कोई फेरबदल न हो, जिससे वित्तीय संस्थानों और लेनदारों के दावों व अधिकारों की पूरी सुरक्षा की जा सके। सभी संबंधित पक्षों को अब न्यायाधिकरण के समक्ष उपस्थित होकर अपना रुख स्पष्ट करना होगा।
व्यक्तिगत दिवालिया योजना पर बैंकों और प्रमोटर में टकराव
इस मामले में विवाद की मुख्य वजह कर्ज वसूली के भारी अंतर को लेकर है:
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विशाल वित्तीय दावा: वित्तीय संस्थानों और प्रमुख बैंकों का कुल दावा 22,006.57 करोड़ रुपये की व्यक्तिगत गारंटियों से संबंधित है।
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प्रस्तावित वसूली राशि: प्रमोटर की व्यक्तिगत समाधान योजना के तहत केवल 6.5 करोड़ रुपये की ही वसूली का प्रस्ताव रखा गया है।
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प्रमुख बैंकों का कड़ा विरोध: एचडीएफसी बैंक और एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस समेत कई शीर्ष वित्तीय संस्थानों ने इस योजना पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसका विरोध किया है।
क्या है व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया का उद्देश्य?
यह कानूनी प्रक्रिया किसी व्यक्ति की भारी वित्तीय देनदारियों और कर्ज चुकाने में असमर्थता की स्थिति में अपनाई जाती है। एनसीएलटी की निगरानी में चलने वाली इस प्रक्रिया का मकसद एक तरफ लेनदारों के अधिक से अधिक बकाये की वसूली करना होता है, वहीं दूसरी तरफ देनदार की संपत्तियों और देनदारियों का पारदर्शी तरीके से अंतिम समाधान निकालना होता है।


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