जयपुर। राजस्थान की राजनीति में स्थानीय निकाय चुनाव केवल गली-मोहल्लों के प्रतिनिधि चुनने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह नेताओं के लिए राज्य स्तर की सियासत में कदम रखने की मजबूत सीढ़ी भी साबित होते रहे हैं। सड़क, पानी और सफाई जैसे बुनियादी मुद्दों से शुरू हुआ कई जनप्रतिनिधियों का सफर विधानसभा और संसद की चौखट तक पहुंचा है। भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही दलों में ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं जिन्होंने नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिकाओं से निकलकर प्रदेश की राजनीति में अपनी अमिट छाप छोड़ी।

जयपुर के वार्डों से विधानसभा और संगठन की कमान तक

राजधानी जयपुर की निकाय राजनीति ने कई बड़े नेताओं को राजनीतिक जमीन मुहैया कराई है। मोहनलाल गुप्ता पार्षद और फिर महापौर बनने के बाद किशनपोल से लगातार तीन बार विधायक चुने गए। सुरेंद्र पारीक पार्षद से सफर शुरू कर हवामहल से दो बार विधानसभा पहुंचे। वहीं अशोक परनामी जयपुर के महापौर बनने के बाद आदर्श नगर से दो बार विधायक रहे और बाद में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद तक पहुंचे। पूर्व महापौर अशोक लाहोटी ने सांगानेर से 2018 में जीत दर्ज की, जबकि पार्षद रहे मानसिंह ने 2013 में परबतसर सीट से विधानसभा का रुख किया।

उदयपुर और अजमेर में भी निकाय बने सियासी लॉन्चपैड

मेवाड़ और मध्य राजस्थान में भी यह सियासी परिपाटी काफी मजबूत रही है। उदयपुर में भानु कुमार शास्त्री पार्षद से विधायक और सांसद बने। किरण माहेश्वरी ने नगर परिषद सभापति से शुरुआत कर सांसद, राजसमंद से तीन बार विधायक और कैबिनेट मंत्री तक का सफर तय किया। फूल सिंह मीणा पार्षद से उदयपुर ग्रामीण के लगातार तीन बार विधायक बने, जबकि त्रिलोक पूर्बिया और ताराचंद जैन ने भी निकाय से विधानसभा का रास्ता तय किया। अजमेर की बात करें तो अनिता भदेल ने स्थानीय निकाय से राजनीति की शुरुआत कर 2003 से 2023 तक लगातार पांच बार अजमेर दक्षिण का प्रतिनिधित्व किया।

कांग्रेस के दिग्गजों ने भी निकायों से गढ़ी पहचान

स्थानीय स्तर से मुख्यधारा की राजनीति में कदम रखने का यह सिलसिला कांग्रेस में भी व्यापक रूप से देखा गया है। अलवर नगर परिषद की पार्षद रहीं पुष्पा शर्मा 1985 में विधायक बनीं। जोधपुर नगर निगम की पार्षद रहीं मनीषा पंवार 2018 में विधानसभा पहुंचीं। नोहर नगर पालिका अध्यक्ष रहे अमित चाचान विधायक चुने गए, जबकि बीकानेर के गोपाल जोशी पार्षद और सभापति रहने के बाद तीन बार विधानसभा पहुंचे।

टिकट मिला पर जीत से चूके कई चेहरे

स्थानीय राजनीति में मजबूत पकड़ के दम पर कई नेताओं को विधानसभा और लोकसभा के टिकट मिले, हालांकि वे जीत दर्ज नहीं कर सके। इनमें शील धाबाई, विक्रम सिंह शेखावत और अर्चना शर्मा जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। वहीं जयपुर की पूर्व महापौर ज्योति खंडेलवाल ने 2019 में लोकसभा का चुनाव लड़ा था, हालांकि उन्हें कामयाबी नहीं मिली।

जमीनी राजनीति की बुनियादी पाठशाला हैं निकाय

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि निकाय राजनीति किसी भी नेता के लिए जमीनी स्तर की व्यावहारिक कार्यशाला की तरह होती है। यहां जनप्रतिनिधियों को सीधे जनता की रोजमर्रा की समस्याओं, अधिकारियों से समन्वय, बजट आवंटन और विकास कार्यों की प्राथमिकताओं से रूबरू होना पड़ता है। यही जमीनी अनुभव और जनता से सीधा संवाद आगे चलकर विधानसभा और बड़े चुनावी समर में उनकी सबसे बड़ी ताकत बनता है।