भीलवाड़ा। राजनीति में अक्सर सफर जमीनी स्तर से शुरू होकर विधानसभा और फिर संसद की चौखट तक पहुंचता है। आमतौर पर नेता पहले पंचायत या निकाय स्तर से शुरुआत कर विधायक और फिर सांसद बनते हैं। हालांकि, भीलवाड़ा की राजनीतिक जमीन ने इसके ठीक उलट एक अनूठी राजनीतिक यात्रा भी देखी है। यहां के दो कद्दावर नेता देश के सर्वोच्च लोकतांत्रिक सदन यानी संसद में पहुंचने के बाद पुनः स्थानीय राजनीति की ओर लौटे और स्थानीय निकायों की कमान संभाली। इनमें पूर्व सांसद हेमेंद्रसिंह बनेड़ा और पूर्व सांसद व पूर्व मंत्री रामपाल उपाध्याय का नाम प्रमुखता से शामिल है।

25 वर्ष की उम्र में सबसे युवा सांसद, फिर बने ग्राम पंचायत के सरपंच

हेमेंद्रसिंह बनेड़ा ने महज 25 वर्ष 3 माह की आयु में 1971 में जनसंघ के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीतकर देश के सबसे युवा सांसद बनने का कीर्तिमान स्थापित किया था। संसद में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने के बाद, करीब डेढ़ दशक बाद 1987 में वे बनेड़ा ग्राम पंचायत के सरपंच निर्वाचित हुए। संसद की ऊंचाइयों पर पहुंचने के बाद गांव के सरपंच का पद संभालना उस दौर की राजनीति में जनसेवा और सादगी का दुर्लभ उदाहरण बना। बाद में 1989 में वे जनता दल के प्रत्याशी के रूप में दूसरी बार लोकसभा पहुंचे, जहां उन्होंने संस्कृत भाषा में शपथ ली थी।

विधायक, मंत्री और सांसद रहने के बाद बने नगर पालिका पार्षद

भीलवाड़ा की सियासत में दूसरा रोचक उदाहरण पूर्व मंत्री रामपाल उपाध्याय का रहा। तीन बार विधायक और राज्य सरकार में उच्च शिक्षा व रोजगार मंत्री रह चुके उपाध्याय वर्ष 1998 में लोकसभा सांसद निर्वाचित हुए थे। प्रदेश और केंद्र की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद वर्ष 2000 में वे गंगापुर नगर पालिका में मनोनीत पार्षद बने। सांसद का कार्यकाल पूरा करने के बाद नगर पालिका की बैठक में बतौर पार्षद शामिल होना यह दर्शाता है कि उनके लिए पद के कद से अधिक जनता के बीच बने रहना मायने रखता था।

बड़े पद के बजाय जमीनी जुड़ाव को दी प्राथमिकता

वर्तमान चुनावी राजनीति में जहां स्थानीय निकायों को उच्च राजनीतिक पदों तक पहुंचने की सीढ़ी माना जाता है, वहीं हेमेंद्रसिंह बनेड़ा का सांसद से सरपंच बनना और रामपाल उपाध्याय का सांसद से पार्षद बनना एक अनूठी मिसाल पेश करता है। दोनों नेताओं ने यह साबित किया कि पद की गरिमा से ज्यादा महत्वपूर्ण स्थानीय स्तर पर नागरिकों से सीधे जुड़े रहना और अपनी राजनीतिक जड़ों का सम्मान करना है। भीलवाड़ा