भारतीय वित्तीय बाजारों में निवेशकों के रुझान को लेकर एक बड़ा ढांचागत बदलाव देखने को मिल रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के आंकड़ों के अनुसार, घरेलू फंड हाउस अब विदेशी बाजारों में मौजूद अवसरों पर आक्रामक दांव लगा रहे हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय म्यूचुअल फंडों की विदेशी इक्विटी होल्डिंग्स मार्च 2025 के 68,072 करोड़ रुपये से 37.5 फीसदी की तेज बढ़त के साथ मार्च 2026 में 93,602 करोड़ रुपये पर पहुंच गई है। वैश्विक परिसंपत्तियों में पहुंच आसान होने के बीच बाजार विशेषज्ञ इसे केवल रिटर्न कमाने का साधन न मानकर एक रणनीतिक पोर्टफोलियो आवंटन के तौर पर देखने की सलाह दे रहे हैं।

गिफ्ट सिटी फंड्स ने घटाई न्यूनतम निवेश सीमा, आम निवेशकों को मिला मौका

हाल ही में पराग पारिख फाइनेंशियल एडवाइजरी सर्विसेज की गिफ्ट सिटी इकाई ने अपने एसएंडपी 500 और नैस्डैक 100 आधारित पैसिव फंड्स में न्यूनतम निवेश सीमा को 5,000 डॉलर से 90 प्रतिशत घटाकर सीधे 500 डॉलर (लगभग 42,000 रुपये) कर दिया है। इस कदम से अब आम खुदरा निवेशकों के लिए भी बिना भारी पूंजी लगाए दुनिया की शीर्ष टेक कंपनियों, सेमीकंडक्टर निर्माताओं और वैश्विक ब्रांडों में सीधे हिस्सेदार बनना आसान हो गया है।

पोर्टफोलियो डायवर्सिफिकेशन के लिए क्यों जरूरी हैं विदेशी बाजार?

वित्तीय विशेषज्ञों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय निवेश का मुख्य उद्देश्य केवल अधिक रिटर्न कमाना नहीं, बल्कि पोर्टफोलियो को अलग-अलग आर्थिक चक्रों और क्षेत्रों से जोड़ना है।

  • अमेरिका: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), बिग टेक, चिपमेकर्स, हेल्थकेयर और वैश्विक उपभोक्ता कंपनियों का गढ़ है।

  • ब्राजील व उभरते देश: ऊर्जा, प्राकृतिक संसाधन और कमोडिटी बाजारों में विविधता प्रदान करते हैं।

  • चीन व एशियाई बाजार: विनिर्माण, तकनीकी सप्लाई चेन और बड़े पैमाने पर घरेलू उपभोग चक्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इस प्रकार वैश्विक आवंटन घरेलू बाजार की मंदी या क्षेत्रीय जोखिमों के असर को संतुलित करने में मदद करता है।

मुद्रा के उतार-चढ़ाव और कराधान की जटिलता को समझना जरूरी

अंतरराष्ट्रीय निवेश में निवेशक अप्रत्यक्ष रूप से विदेशी मुद्रा पर भी दांव लगाता है। यदि अमेरिकी बाजार में 10% की बढ़त होती है और डॉलर रुपये के मुकाबले मजबूत होता है, तो भारतीय निवेशक का शुद्ध रिटर्न बढ़ जाता है। वहीं यदि रुपया मजबूत होता है, तो अच्छे बाजार रिटर्न के बावजूद घरेलू मुद्रा में वास्तविक मुनाफा कम हो सकता है।

इसके अलावा कराधान नियमों की अनदेखी भारी पड़ सकती है:

  • सीधे खरीदे गए विदेशी शेयरों पर कैपिटल गेन टैक्स और होल्डिंग अवधि घरेलू शेयरों से अलग होती है।

  • लाभांश (डिविडेंड) पर संबंधित देश का विथहोल्डिंग टैक्स लागू होता है, जिसकी रिपोर्टिंग भारतीय आयकर रिटर्न में अनिवार्य है।

  • एलआरएस रूट पर 7 लाख रुपये से अधिक के रेमिटेंस पर 20% टीसीएस (टैक्स कलेक्टेड एट सोर्स) कटता है, जिसे बाद में टैक्स रिफंड के जरिए क्लेम किया जा सकता है।

  • गिफ्ट सिटी आधारित फंड्स का टैक्स ढांचा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से काफी अलग और विशिष्ट होता है।

विदेशी निवेश के तीन प्रमुख रास्ते

  • घरेलू अंतरराष्ट्रीय म्यूचुअल फंड व ईटीएफ: भारतीय फंड हाउस की अंतरराष्ट्रीय स्कीम्स में रुपये के जरिए एसआईपी या एकमुश्त 500 से 1,000 रुपये से निवेश संभव है। यह बेहद आसान विकल्प है, जिसके लिए अलग खाते की जरूरत नहीं होती। हालांकि, आरबीआई की 7 अरब डॉलर की समग्र सीमा के चलते कई बार नए निवेश पर रोक लग जाती है।

  • आरबीआई एलआरएस स्कीम: लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम के तहत निवेशक विदेशी ब्रोकर के जरिए सीधे अमेरिकी बाजारों से शेयर खरीद सकते हैं। इसमें सालाना 2.5 लाख डॉलर तक निवेश की छूट और अपनी पसंद की कंपनियां चुनने की आजादी मिलती है, लेकिन बैंक ट्रांसफर चार्ज, 20% टीसीएस और टैक्स फाइलिंग की जटिलता इसकी मुख्य सीमाएं हैं।

  • गिफ्ट सिटी फंड्स: आईएफएससी में पंजीकृत फंड्स के जरिए निवेशक डॉलर आधारित ग्लोबल इंडेक्स में न्यूनतम 500 डॉलर से पैसा लगा सकते हैं। यह घरेलू नियमन के तहत एक सुरक्षित और व्यवस्थित डॉलर निवेश माध्यम है, यद्यपि इसमें बैंक से फंड ट्रांसफर की प्रक्रिया और सीमित फंड विकल्प जैसी चुनौतियां शामिल हैं।

विशेषज्ञ सलाह: 5 से 15% तक रखें विदेशी आवंटन

वित्तीय सलाहकारों का सुझाव है कि अंतरराष्ट्रीय इक्विटी कुल निवेश पोर्टफोलियो का 5 से 15 प्रतिशत तक ही होनी चाहिए। विदेश में निवेश का फैसला लेने से पहले आपातकालीन फंड (इमरजेंसी फंड), टर्म व हेल्थ इंश्योरेंस और भारत के भीतर एक सुदृढ़ इक्विटी-डेट पोर्टफोलियो तैयार करना जरूरी है। जब घरेलू बुनियादी वित्तीय लक्ष्य सुरक्षित हो जाएं, तभी अपनी जोखिम क्षमता के अनुसार वैश्विक परिसंपत्तियों में कदम बढ़ाना समझदारी भरा कदम होगा।