अचानक वित्तीय संकट सामने आने पर जब बैंक खराब सिबिल स्कोर के कारण हाथ खड़े कर दें, तब पारंपरिक जीवन बीमा पॉलिसी नकदी की तात्कालिक जरूरतें पूरी करने का एक सुलभ और सुरक्षित जरिया बन सकती है। कानपुर के कपड़ा कारोबारी शिशिर गुप्ता के मामले ने इस वित्तीय विकल्प की उपयोगिता को फिर रेखांकित किया है। 640 सिबिल स्कोर होने के कारण जब बैंक ने उन्हें पर्सनल लोन देने से मना कर दिया और एनबीएफसी भारी ब्याज मांग रहे थे, तब सीए की सलाह पर उन्होंने अपनी एलआईसी पॉलिसी पर लोन लिया। बिना किसी क्रेडिट स्कोर जांच और बिना अनिवार्य ईएमआई के महज 48 घंटे के भीतर उन्हें सामान्य ब्याज दर पर पूंजी उपलब्ध हो गई।

कैसे काम करता है पॉलिसी लोन?

अधिकांश भारतीय जीवन बीमा पॉलिसियों को केवल भावनात्मक निवेश या मृत्यु उपरांत मिलने वाला लाभ मानते हैं, जबकि यह आपातकालीन नकदी का मजबूत साधन भी है।

  • बीमा कंपनियां या बैंक पॉलिसी के कुल सम इंश्योर्ड (बीमा कवर) पर नहीं, बल्कि उसकी संचित सरेंडर वैल्यू के आधार पर कर्ज स्वीकृत करते हैं।

  • इस प्रक्रिया में पॉलिसी सरेंडर नहीं होती, बल्कि केवल गारंटी के रूप में गिरवी रखी जाती है और जीवन बीमा कवर पूरी तरह सुरक्षित बना रहता है।

पर्सनल लोन बनाम पॉलिसी लोन: मुख्य तुलना

  • ब्याज दरें: असुरक्षित पर्सनल लोन पर बैंक 12 से 18% या उससे भी अधिक ब्याज वसूलते हैं, जबकि पॉलिसी लोन बीमा कंपनियों से 9 से 10% और बैंकों से 10 से 15% की दर पर मिल जाता है।

  • क्रेडिट स्कोर जांच: पर्सनल लोन के लिए सिबिल स्कोर अनिवार्य होता है और खराब स्कोर पर आवेदन खारिज हो जाता है, जबकि पॉलिसी लोन में कोई सिबिल या क्रेडिट जांच नहीं होती।

  • ईएमआई का दबाव: पर्सनल लोन में हर महीने तय तारीख पर अनिवार्य ईएमआई भरनी पड़ती है, जबकि पॉलिसी लोन में कोई फिक्स्ड ईएमआई नहीं होती और ब्याज अपनी सुविधानुसार चुकाने की छूट रहती है।

  • कागजी कार्रवाई: आय प्रमाण और बैंक स्टेटमेंट जैसी लंबी प्रक्रिया के मुकाबले पॉलिसी लोन न्यूनतम औपचारिकताओं के साथ तुरंत स्वीकृत हो जाता है।

किन पॉलिसियों पर मिलता है कर्ज और क्या हैं नियम?

पॉलिसी लोन केवल उन्हीं योजनाओं पर मिलता है जिनमें बचत का घटक शामिल होता है:

  • पात्र पॉलिसियां: एंडोमेंट प्लान, मनी-बैक, होल लाइफ इंश्योरेंस और चुनिंदा यूलिप। शुद्ध सुरक्षा देने वाले टर्म इंश्योरेंस में कोई सरेंडर वैल्यू नहीं होती, इसलिए उन पर कर्ज नहीं मिलता।

  • पात्रता अवधि: एलआईसी में आमतौर पर कम से कम 3 वर्ष (सिंगल प्रीमियम में 1 वर्ष) तक प्रीमियम भरने के बाद यह सुविधा मिलती है।

  • कर्ज सीमा: चालू पॉलिसी पर सरेंडर वैल्यू का 90% तक और पेड-अप पॉलिसी पर करीब 85% तक कर्ज मिल जाता है। उदाहरण के लिए, यदि एंडोमेंट पॉलिसी की सरेंडर वैल्यू 4 लाख रुपये है, तो उस पर लगभग 3.60 लाख रुपये तक का लोन आसानी से मिल सकता है।

कब लें यह कर्ज और लंबी अवधि में क्यों बचें?

यह विकल्प 6 महीने से 1 साल तक की तात्कालिक नकदी जरूरतों के लिए सबसे उपयुक्त है, ताकि मैच्योरिटी के करीब पहुंच चुकी बोनस वाली पॉलिसी को समय से पहले न तोड़ना पड़े। साथ ही यह 15 से 18% वाले महंगे पर्सनल लोन या क्रेडिट कार्ड कर्ज से बचने का कारगर साधन है।

हालांकि, इसे कभी भी लंबी अवधि की उधारी नहीं बनाना चाहिए। पारंपरिक एंडोमेंट पॉलिसियों पर मिलने वाला वास्तविक रिटर्न औसतन 5 से 6% होता है, जबकि लोन पर ब्याज 9 से 10% लगता है। लंबे समय तक ब्याज और मूलधन न चुकाने पर चक्रवृद्धि ब्याज पूरी मैच्योरिटी वैल्यू को खत्म कर सकता है।

इन 4 बड़े जोखिमों पर रखें पैनी नजर

  • ब्याज पर ब्याज का बोझ: सालाना ब्याज समय पर न चुकाने पर वह मूलधन में जुड़ता जाता है, जिससे बिना अतिरिक्त रकम निकाले भी कर्ज का आकार तेजी से बढ़ता है।

  • पॉलिसी जब्ती का खतरा: यदि कुल बकाया कर्ज और संचित ब्याज की रकम पॉलिसी की सरेंडर वैल्यू के बराबर पहुंच जाती है, तो बीमा कंपनी पॉलिसी को जब्त कर लेती है और लाइफ कवर हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।

  • डेथ क्लेम में कटौती: लोन अवधि के दौरान यदि पॉलिसीधारक के साथ कोई अनहोनी हो जाए, तो आश्रितों को पूरा डेथ क्लेम नहीं मिलता। कंपनी पहले बकाया कर्ज और ब्याज काटती है, उसके बाद शेष राशि ही परिजनों को दी जाती है।

  • सस्ते विकल्पों से तुलना: पॉलिसी लोन लेने से पहले बैंक ओवरड्राफ्ट या गोल्ड लोन की ब्याज दरों से तुलना जरूर कर लें, क्योंकि कई बार गोल्ड लोन इससे भी सस्ती दरों पर उपलब्ध हो जाते हैं।