आशा भोसले और मोहम्मद रफी साहब का मशहूर नगमा भले ही दशकों पुराना हो चुका हो, लेकिन जब भी संगीतप्रेमी आशा ताई को याद करते हैं, तो उनके सुरीले गीत अपने आप होठों पर आ जाते हैं। अपनी 93वीं जयंती पर आशा ताई भले ही हमारे बीच सशरीर उपस्थित न हों, लेकिन उनकी मखमली आवाज़ सदियों तक संगीत प्रेमियों के दिलों में ज़िंदा रहेगी। अपने जन्मदिन से कुछ महीने पहले 12 अप्रैल को संगीत जगत की इस स्वर साम्राज्ञी ने दुनिया को अलविदा कह दिया था। बहुत कम लोग जानते हैं कि आशा जी न केवल सुरों की महारथी थीं, बल्कि स्वाद और व्यंजनों की दुनिया में भी उनका कोई सानी नहीं था।

9 वर्ष की उम्र में सिर से उठा पिता का साया और मुंबई का सफर

आशा भोसले ने मात्र 10 वर्ष की आयु में ही संगीत की दुनिया में कदम रख दिया था। उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर प्रसिद्ध रंगमंच अभिनेता और शास्त्रीय गायक थे, जिससे उनका बचपन सुरों के बीच बीता। हालांकि, जब वे महज 9 साल की थीं, तब उनके पिता का असमय निधन हो गया। पिता के जाने के बाद मंगेशकर परिवार पर गहरा आर्थिक संकट आ पड़ा। जीवन यापन की तलाश में परिवार पुणे और कोल्हापुर से होते हुए आखिरकार मुंबई आ बसा। परिवार को वित्तीय सहारा देने के लिए 14 वर्षीय बड़ी बहन लता मंगेशकर के साथ 9 वर्षीय आशा ने भी पेशेवर गायन शुरू किया।

मराठी फिल्म से शुरुआत और संघर्षपूर्ण शुरुआती दौर

बचपन में आशा ताई अपनी बड़ी बहन लता दीदी के साथ ही रहती थीं। उन्होंने अपना पहला फिल्मी गाना वर्ष 1943 में मराठी फिल्म 'मझा बल' के लिए 'चला चला नव बाला' गाया था, तब उनकी उम्र मात्र 10 वर्ष थी। इसके बाद उन्होंने हिंदी समेत अनेक भाषाओं में हज़ारों गीत गाए। शुरुआती दौर में गीता दत्त, शमशाद बेगम और लता मंगेशकर जैसी स्थापित गायिकाओं का वर्चस्व था, जिसके कारण आशा जी को प्रायः कठिन या सेकेंड-ग्रेड की फिल्मों के गीत ही मिलते थे। लेकिन अपनी अद्भुत मेहनत से उन्होंने हर तरह के गानों में महारत हासिल की।

रिकॉर्डिंग के समय का एक यादगार संस्मरण

संगीत के शुरुआती दिनों में एक दिलचस्प घटना घटी जब प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन ने लता मंगेशकर और आशा भोसले को फिल्म 'बसंत बहार' का राग भैरवी पर आधारित गाना 'कर गया रे... कर गया रे मुझपे जादू' ऑफर किया। रिकॉर्डिंग के दिन आशा ताई समय पर तैयार हो गईं, लेकिन लता दीदी रियाज़ करने में मग्न थीं। चूंकि आशा जी को एक और रिकॉर्डिंग के लिए जाना था, तो अधीर होकर वे रिहर्सल रूम में गईं और प्यार से चिल्लाते हुए बोलीं, 'अब चलिए, मैं और इंतज़ार नहीं कर सकती!' इस पर लता दीदी ने मुस्कुराकर उन्हें देखा और दोनों रिकॉर्डिंग के लिए रवाना हो गईं।

पारिवारिक उतार-चढ़ाव और निजी जीवन की चुनौतियां

16 वर्ष की उम्र में आशा जी ने परिवार की मर्जी के खिलाफ जाकर गणपत राव भोसले से विवाह किया था। हालांकि, यह विवाह सुखद नहीं रहा और घरेलू प्रताड़ना के चलते वर्ष 1960 में वे अपने बच्चों के साथ वापस अपनी मां के घर लौट आईं। इस कठिन समय में लता दीदी और परिवार ने उन्हें पूरा सहारा दिया। बाद में वर्ष 1980 में उन्होंने प्रसिद्ध संगीतकार राहुल देव बर्मन (पंचम दा) से विवाह किया, जिन्होंने जीवन के अंतिम पड़ाव (1994) तक उनका हर मोड़ पर साथ निभाया।

कुकिंग का शौक और अंतरराष्ट्रीय रेस्टोरेंट चेन

यदि आशा भोसले गायिका न होतीं, तो वे एक बेहतरीन शेफ बनतीं। उन्हें खाना बनाने का बेहद शौक था और पूरी फिल्म इंडस्ट्री में उनके हाथ के बने कड़ाही गोश्त, पाया करी और शामी कबाब के चर्चे थे। अभिनेता ऋषि कपूर भी उनके बनाए व्यंजनों के मुरीद थे। उन्होंने विदेशों में अपने नाम से रेस्टोरेंट की सफल चेन भी शुरू की, जहाँ दुबई और कुवैत में उनके रेस्टोरेंट काफी प्रसिद्ध हैं।

संगीत का अंतिम अध्याय

अपनी जीवनयात्रा के अंतिम दौर में भी उनका संगीत के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ। 92 वर्ष की आयु में उन्होंने प्रसिद्ध म्यूजिकल प्रोजेक्ट गोरिल्लाज के साथ 'द शैडोई लाइट' नाम का एक विशेष ट्रैक रिकॉर्ड किया था, जो फरवरी 2026 में रिलीज़ हुआ। यह गाना आज भी दुनिया भर के संगीत प्रेमियों द्वारा खूब सुना जा रहा है।