खाड़ी देशों को बड़ा झटका? भारत के LPG बाजार में अमेरिका की एंट्री मजबूत
पश्चिम एशिया में चल रहे टकराव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज मार्ग बंद होने के कारण भारतीय घरेलू गैस बाजार की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। ऊर्जा आपूर्ति के प्रभावित होने से देश ने अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए नए विकल्पों को अपनाया है, जिसके चलते पिछले कुछ महीनों में भारत के एलपीजी आयात के समीकरण में बड़ा फेरबदल देखने को मिला है।
मध्य पूर्व के संकट का घरेलू बाजार पर असर
भारतीय रसोई गैस की कुल आवश्यकता का लगभग साठ प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा किया जाता है। सामान्य परिस्थितियों में देश अपनी कुल एलपीजी मांग का करीब नब्बे प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशिया से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के समुद्री मार्ग के माध्यम से मंगवाता था। परंतु, क्षेत्र में छिड़े युद्ध के कारण इस प्रमुख व्यापारिक मार्ग पर जहाजों का आवागमन गंभीर रूप से बाधित हुआ है, जिससे भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अन्य देशों की तरफ रुख करना पड़ा है।
आयात के आंकड़ों में अमेरिकी हिस्सेदारी शीर्ष पर
विगत छह महीनों के भीतर अमेरिका भारत का सबसे प्रमुख एलपीजी प्रदायक बनकर उभरा है। मार्च से अगस्त 2026 के बीच के आंकड़ों के अनुसार, भारत के कुल एलपीजी आयात में अमेरिकी हिस्सेदारी भारी उछाल के साथ तिरेपन प्रतिशत तक पहुंच गई है, जबकि सितंबर 2025 से फरवरी 2026 के दौरान यह महज 7.9 प्रतिशत पर सिमटी हुई थी। इस प्रकार छह महीनों के अंतराल में अमेरिकी हिस्सेदारी में करीब सात गुना की अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है।
खाड़ी देशों के आयात में आई भारी गिरावट
शिपिंग आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि पश्चिम एशिया के पारंपरिक आपूर्तिकर्ता देशों की बाजार में पकड़ काफी कमजोर हुई है। युद्ध से पूर्व यूएई भारत का सबसे बड़ा एलपीजी स्रोत हुआ करता था, जिसकी हिस्सेदारी 37.8 प्रतिशत से घटकर 13.4 प्रतिशत रह गई है। इसके अलावा कतर की हिस्सेदारी 21.1 प्रतिशत से घटकर 5.7 प्रतिशत, कुवैत की 15.1 प्रतिशत से गिरकर 4.9 प्रतिशत और सऊदी अरब की हिस्सेदारी 14.1 प्रतिशत से घटकर 5.9 प्रतिशत पर आ गई है। कुल आयात की मात्रा घटने के बावजूद अमेरिका से होने वाले आयात में लगभग तीन सौ प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।


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