लखनऊ: उत्तर प्रदेश सरकार ग्रामीण क्षेत्रों के स्थानीय निकायों और जिला पंचायतों को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने के लिए एक बड़ा प्रशासनिक फेरबदल करने जा रही है। इस नई नीति के तहत जिला पंचायतों की भौगोलिक सीमाओं का निर्धारण पूरी तरह से साफ किया जाएगा। इसके साथ ही, रजिस्ट्री के दौरान लगने वाले 2 फीसदी अतिरिक्त स्टांप शुल्क की कमाई में अब जिला पंचायतों को भी उनका वाजिब हिस्सा दिया जाएगा। यही नहीं, ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में नक्शा पास करने को लेकर विकास प्राधिकरणों और जिला पंचायतों के बीच होने वाले सीमा विवादों को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए विकास प्राधिकरणों के बोर्ड में जिला पंचायतों के अपर मुख्य अधिकारियों (AMA) को बतौर सदस्य जगह दी जाएगी।

कानूनों में होगा संशोधन, जिला पंचायतों को ट्रांसफर होगा 'अम्बार शुल्क'

शासन के उच्च स्तर पर हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में यह सहमति बनी है कि ग्रामीण अंचलों में विकास प्राधिकरणों द्वारा वसूले जा रहे 'अम्बार शुल्क' को अब सीधे जिला पंचायतों के खाते में ट्रांसफर किया जाएगा। इसके अलावा:

  • 2 प्रतिशत अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी का एक तय हिस्सा जिला पंचायतों को सौंपने के लिए संबंधित अधिनियमों और कानूनी प्रावधानों में जरूरी संशोधन किए जाएंगे।

  • आपको बता दें कि अब तक यह अतिरिक्त स्टांप शुल्क केवल संबंधित नगर निगमों और स्थानीय विकास प्राधिकरणों की झोली में जाता था, जिससे जिला पंचायतों के पास विकास कार्यों के लिए बजट की कमी बनी रहती थी।

इसके साथ ही, विकास प्राधिकरणों को मिलने वाले विकास शुल्क (डेवलपमेंट चार्ज) के सही इस्तेमाल और मॉनिटरिंग के लिए कमिश्नर (मंडलायुक्त) की अगुवाई में काम करने वाली 'अंवेषणा विकास निधि समिति' में भी जिला पंचायत के एएमए को सदस्य के रूप में शामिल किया जाएगा। पंचायती राज और आवास विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि यह नया नियम ग्रामीण उत्तर प्रदेश के भीतर एक सुव्यवस्थित, सुरक्षित और निरंतर विकास को रफ्तार देने में मील का पत्थर साबित होगा।

क्षेत्राधिकार का विवाद होगा खत्म, स्पष्ट हुई 'ग्रामीण क्षेत्र' की परिभाषा

ग्रामीण इलाकों में अवैध कॉलोनियों पर लगाम लगाने और सुनियोजित विकास का खाका खींचने के लिए सरकार द्वारा गठित एक हाई-पावर कमेटी ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट शासन को सौंप दी है। इस रिपोर्ट के आधार पर विकास प्राधिकरणों और जिला पंचायतों के बीच जमीन के मालिकाना हक या नक्शा पास करने के अधिकार क्षेत्र को लेकर होने वाले टकराव को रोकने के लिए 'ग्राम्य क्षेत्र' (रूरल एरिया) के कानूनी दायरे को नए सिरे से परिभाषित किया गया है।

अब से प्राधिकरणों के तहत आने वाले नोटिफाइड एरिया, रेगुलेटेड एरिया, स्पेशल डेवलपमेंट एरिया, इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट एरिया (जैसे नोएडा या गीडा के क्षेत्र) और हाउसिंग बोर्ड के नोटिफाइड एरिया को ग्रामीण क्षेत्र की परिभाषा से पूरी तरह अलग कर दिया गया है। जिला पंचायतों के अधीन आने वाली जमीनों पर निर्माण कार्य के लिए भी अब विकास प्राधिकरणों के 'बिल्डिंग बायलॉज' (भवन उपविधि) की तर्ज पर ही एक नया मॉडल बायलॉज तैयार किया गया है, जिससे आम जनता को अपने घर या दुकान का नक्शा पास कराने में दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।

बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए प्रदेश स्तर पर बनेगी 'टेक्निकल सेल'

ग्रामीण क्षेत्रों में बनने वाली बहुमंजिला इमारतों और बड़े आवासीय प्रोजेक्ट्स पर नजर रखने के लिए भी सरकार ने तैयारी कर ली है। देहाती इलाकों में 15 मीटर से ज्यादा ऊंचे कमर्शियल या रेजिडेंशियल भवनों और 5 हेक्टेयर से बड़े लैंड ले-आउट को पास करने के लिए राज्य स्तर पर एक विशेष 'तकनीकी सेल' (Technical Cell) बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। यह सेल सीधे राजधानी से बड़े प्रोजेक्ट्स की री-चेकिंग और क्लीयरेंस देगी, जिससे निर्माण कार्यों में पारदर्शिता आएगी। इस बड़े नीतिगत बदलाव के बाद गोरखपुर, वाराणसी, प्रयागराज और कानपुर जैसे बड़े जिलों के ग्रामीण इलाकों के विकास को एक नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।