जंगल छोटा, खतरा बड़ा! गिर के शेरों के सामने अस्तित्व की नई चुनौती
अहमदाबाद। गुजरात के सुप्रसिद्ध गिर राष्ट्रीय उद्यान से एक बेहद विचलित करने वाली खबर सामने आई है, जहाँ हाल ही में आठ एशियाई शेर शावकों की असमय मौत हो गई है। इस दुखद घटना ने वैश्विक स्तर पर वन्यजीव प्रेमियों, पर्यावरणविदों और पशु संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं को गहरी चिंता में डाल दिया है। संपूर्ण विश्व में केवल इसी क्षेत्र में पाए जाने वाले एशियाई शेरों की सुरक्षा और उनकी देखरेख की वर्तमान व्यवस्था पर इस घटना के बाद एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। प्रशासन अब इस बात की गहन समीक्षा कर रहा है कि आखिर सुरक्षा चक्र के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में शावकों की जान कैसे चली गई।
भीषण गर्मी और कमजोर इम्युनिटी बनी मौत की मुख्य वजह
वन्यजीव विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा किए गए शुरुआती आकलनों के अनुसार, इन नन्हे शावकों की मौत के पीछे मौसम का कड़ा मिजाज और शारीरिक कमियां मुख्य रूप से जिम्मेदार रही हैं। क्षेत्र में पड़ रही अत्यधिक और रिकॉर्डतोड़ गर्मी के कारण शावक भारी तनाव और डिहाइड्रेशन का शिकार हो गए। इसके साथ ही, कम उम्र होने के कारण उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) भी काफी कमजोर थी, जिसके चलते वे मौसम के इस जानलेवा प्रभाव को सहन नहीं कर सके और उन्होंने दम तोड़ दिया।
'गिर पैराडॉक्स' और शेरों के संरक्षण का अनूठा इतिहास
इस दुखद घटना ने 'गिर पैराडॉक्स' यानी गिर के अंतर्विरोध को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। लगभग एक शताब्दी पहले एक समय ऐसा था जब अंधाधुंध शिकार और सिकुड़ते जंगलों के कारण एशियाई शेर पूरी तरह विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए थे। इसके बाद सरकार और स्थानीय लोगों के सहयोग से शुरू हुए बेहद कड़े और ऐतिहासिक संरक्षण अभियानों के कारण इनकी आबादी में चमत्कारी सुधार देखने को मिला। इसे आधुनिक विश्व के सबसे सफल और अनुकरणीय वन्यजीव पुनरुद्धार अभियानों में गिना जाता है, जिसने शेरों को विलुप्त होने से बचा लिया।
एक दशक में तेजी से बढ़ी आबादी, मगर चुनौतियां अब भी बरकरार
प्राकृतिक संरक्षण के इन लगातार प्रयासों का ही परिणाम है कि गिर में शेरों का कुनबा लगातार बड़ा होता जा रहा है। आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2015 की गणना में जहाँ गिर के जंगलों में शेरों की कुल संख्या महज 523 दर्ज की गई थी, वहीं जनवरी 2026 तक के नवीनतम सर्वे में यह संख्या काफी हद तक बढ़कर 891 के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई है। हालांकि, शेरों की इस बढ़ती तादाद के बीच सीमित होते जा रहे जंगल और अचानक बदलने वाले मौसम ने प्रबंधन के सामने नई और जटिल चुनौतियां खड़ी कर दी हैं, जिससे निपटने के लिए अब नए सिरे से रणनीति बनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।


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