650 निजी स्कूलों की बसें जांच के दायरे में, प्रशासन ने बढ़ाई सख्ती
हिसार: हरियाणा के नूंह में सामने आए एक संवेदनशील मामले के बाद राज्य मानवाधिकार आयोग ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। आयोग के सख्त निर्देश पर अब प्रदेश भर के साथ-साथ हिसार जिले में भी समस्त निजी शिक्षण संस्थानों की बसों की सघन जांच का अभियान शुरू कर दिया गया है। इस राष्ट्रव्यापी सुरक्षा पहल के अंतर्गत जिले के करीब 650 निजी स्कूलों के बेड़े में शामिल 2300 से अधिक बसों की फिटनेस और सुरक्षा मानकों को परखा जाएगा। इस व्यापक चेकिंग अभियान को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर जिले में छह विशेष जांच केंद्र स्थापित किए गए हैं, ताकि बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वाले वाहनों पर नकेल कसी जा सके।
नूंह के छछेड़ा गांव की घटना के बाद जागा प्रशासन
इस बड़े प्रशासनिक कदम की पृष्ठभूमि नूंह जिले के अंतर्गत आने वाले गांव छछेड़ा के एक निजी विद्यालय से जुड़ी हुई है, जहां एक सात वर्षीय मासूम छात्रा के साथ शिक्षक द्वारा बर्बरतापूर्वक मारपीट करने का मामला प्रकाश में आया था। इस घटना के बाद जब जांच टीम ने साक्ष्य जुटाने के उद्देश्य से स्कूल बस के चालक से सीसीटीवी फुटेज की मांग की, तो यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि बस के भीतर सीसीटीवी कैमरे ही स्थापित नहीं थे। सुरक्षा में इस गंभीर लापरवाही को संज्ञान में लेते हुए मानवाधिकार आयोग ने प्रादेशिक स्तर पर आरटीए (RTA) और संबंधित विभागों को तत्काल प्रभाव से सभी स्कूली वाहनों की चेकिंग कर विस्तृत रिपोर्ट सौंपने के आदेश जारी किए।
पुलिस लाइन में बसों की अनिवार्य चेकिंग और ईंधन की बर्बादी पर सवाल
आयोग के आदेश के अनुपालन की पहली कड़ी के तहत शनिवार को हिसार शहर के विभिन्न निजी स्कूलों की बसों को सामूहिक रूप से पुलिस लाइन परिसर में एकत्र होने के निर्देश दिए गए हैं। वहां क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकरण की विशेष तकनीकी टीमें इन वाहनों की फिटनेस, कागजातों और अन्य तकनीकी पहलुओं की बारीकी से जांच कर एक आधिकारिक रिपोर्ट तैयार करेंगी। हालांकि, इस व्यवस्था को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध के स्वर भी उठ रहे हैं, क्योंकि एक ओर सरकार ईंधन संरक्षण का संदेश देती है, वहीं दूसरी ओर मुख्य बस स्टैंड से करीब पौने चार किलोमीटर दूर स्थित पुलिस लाइन तक हजारों बसों को बुलाए जाने से ईंधन की भारी बर्बादी हो रही है, जिससे नियम कायदों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के सख्त सुरक्षा मानकों को परखने की कवायद
इस विशेष जांच अभियान के दौरान परिवहन विभाग की टीमें मुख्य रूप से माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्कूली छात्र-छात्राओं की सुरक्षा के लिए तय किए गए कड़े नियमों की उपलब्धता की जांच कर रही हैं। इसके तहत सभी बसों का रंग अनिवार्य रूप से पीला होना, आगे-पीछे स्पष्ट अक्षरों में स्कूल बस अथवा अनुबंधित होने पर 'ऑन स्कूल ड्यूटी' लिखा होना बेहद जरूरी है। इसके अलावा, खिड़कियों पर लोहे की सुरक्षित ग्रिल, दरवाजों पर मजबूत ऑटोमैटिक लॉक, सीटों के नीचे बैग रखने की समुचित जगह, प्राथमिक चिकित्सा (फर्स्ट एड) बॉक्स और वैध अग्निशमन यंत्रों की मौजूदगी को अनिवार्य रूप से परखा जा रहा है।
वाहनों में आधुनिक तकनीक और चालकों की योग्यता की होगी सघन जांच
छात्रों के सुरक्षित सफर को सुनिश्चित करने के लिए इस अभियान में आधुनिक तकनीकों की उपलब्धता पर विशेष जोर दिया जा रहा है, जिसमें वाहनों में गति नियंत्रक (स्पीड गवर्नर), जीपीएस ट्रैकिंग सिस्टम और चालू हालत में सीसीटीवी कैमरों का होना सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। इसके साथ ही, बसों के चालकों के पास भारी वाहन चलाने का न्यूनतम 5 वर्षों का वैध अनुभव होना चाहिए और उनका पिछला रिकॉर्ड किसी भी प्रकार के ट्रैफिक उल्लंघन या शराब पीकर गाड़ी चलाने से मुक्त होना आवश्यक है। परिवहन विभाग का कहना है कि सुरक्षा नियमों की अनदेखी करने वाले स्कूलों और बस संचालकों के खिलाफ परमिट रद्द करने सहित भारी जुर्माने की दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।


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