जबलपुर में कृषि कंपनी की कथित धांधली, डायरेक्टरों समेत 9 लोगों पर मामला दर्ज
जबलपुर/पाटन: मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले के पाटन इलाके से फर्जी दस्तावेजों और कागजी हेरफेर के सहारे सरकारी खजाने को लाखों रुपये की चपत लगाने का एक बेहद सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। यहाँ बेगमगंज सीड प्रोड्यूसर लिमिटेड नामक कंपनी द्वारा कूट रचित (फर्जी) दस्तावेजों के दम पर शासन को कुल 39 लाख 67 हजार 7 सौ 81 रुपये का भारी-भरकम आर्थिक नुकसान पहुंचाया गया है। किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के सहायक संचालक रवि कुमार आम्रवंशी द्वारा दर्ज कराई गई लिखित शिकायत पर पाटन थाना पुलिस ने एक बड़ी और सख्त दंडात्मक कार्रवाई की है।
इस हाई-प्रोफाइल संगठित फर्जीवाड़े में जबलपुर कलेक्टर के आधिकारिक अनुमोदन और हरी झंडी मिलने के बाद पुलिस ने कंपनी के 6 डायरेक्टरों (संचालकों) और 3 सेवारत कर्मचारियों समेत कुल 9 नामजद लोगों के खिलाफ धोखाधड़ी का आपराधिक मामला दर्ज किया है। प्राथमिकी में नामजद आरोपियों में कंपनी के पदाधिकारी सचिन दुबे, रंजना पाण्डे, संदीप दुबे, अंशुल बर्मन, नेहा पाण्डे, उमा सिंह सहित कंपनी प्रबंधक मनीष चौरसिया, लेखापाल कमलेश साहू और कंप्यूटर ऑपरेटर नीलेश विश्वकर्मा शामिल हैं।
किसान मजदूर महासंघ के जिला अध्यक्ष राजेंद्र सिंह द्वारा पूर्व में की गई शिकायत के बाद गठित जांच दल की रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला सच सामने आया कि इन सभी आरोपियों ने आपसी सांठगांठ कर फर्जी बैंक खाते और कागजी किसानों की जाली सूची तैयार की थी, जिसके जरिए शासकीय अनुदान और उपार्जन राशि का खुलेआम गबन किया गया। पाटन थाना पुलिस ने इस गंभीर वित्तीय अपराध में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (मूल्यवान सुरक्षा की जालसाजी) और 34 (समान आशय) के तहत मुकदमा पंजीकृत कर आगे की तफ्तीश निरीक्षक गोपीन्द्र सिंह राजपूत को सौंप दी है।
फर्जी बैकडेटेड नियुक्तियां और जाली हस्ताक्षरों का खेल
कृषि विभाग के जांच प्रतिवेदन (इंस्पेक्शन रिपोर्ट) में इस बात का साफ तौर पर खुलासा हुआ है कि बेगमगंज सीड प्रोड्यूसर लिमिटेड कंपनी के डायरेक्टरों ने नियम-कायदों को ताक पर रखकर अपनी मनमर्जी चलाई। कंपनी के आधिकारिक रिकॉर्ड या बोर्ड बैठकों में बिना किसी वैध प्रस्ताव, सर्वसम्मति या निर्णय के ही सीधे प्रबंधक मनीष चौरसिया, कंप्यूटर ऑपरेटर नीलेश विश्वकर्मा और लेखापाल कमलेश साहू के नाम पर फर्जी नियुक्ति पत्र (अपॉइंटमेंट लेटर्स) जारी कर दिए गए।
हैरानी की बात यह है कि इन जाली नियुक्ति पत्रों पर न तो कोई जारी होने की तारीख अंकित थी और न ही उन पर किए गए जिम्मेदारों के हस्ताक्षर आपस में मेल खा रहे थे। जांच दल ने इन सभी संदेहास्पद नियुक्ति आदेशों को पूरी तरह फर्जी और मनगढ़ंत पाया है, जिन्हें केवल फाइलों की खानापूर्ति करने और वित्तीय धोखाधड़ी के ताने-बाने को बुनने के लिए तैयार किया गया था।
फर्जी बैंक खाता दिखाकर हासिल की पात्रता, मोबाइल वेरिफिकेशन में खुली पोल
शासकीय नियमों और दिशा-निर्देशों के मुताबिक, उपार्जन (प्रोकेयरमेंट) का कार्य आवंटित होने के लिए किसी भी पंजीकृत कंपनी के पास न्यूनतम 50 लाख रुपये की लिक्विड नकदी या उतनी ही क्रेडिट लिमिट (बैंक गारंटी) होना अनिवार्य शर्त है। इस अनिवार्य पात्रता मानदंड को छल-कपट से पूरा करने के लिए कंपनी के कर्ताधर्ताओं ने आईसीआईसीआई (ICICI) बैंक का एक खाता संख्या 734505500175 दस्तावेजों में प्रस्तुत किया था।
मगर जब जिला प्रशासन और बैंक प्रबंधन के माध्यम से इस बैंक खाते का जमीनी सत्यापन (वेरिफिकेशन) कराया गया, तो एक बड़ा सच सामने आया कि यह खाता बेगमगंज सीड प्रोड्यूसर लिमिटेड कंपनी के नाम पर रजिस्टर्ड था ही नहीं, बल्कि किसी अन्य खाते को जाली तरीके से कंपनी का बताकर पेश किया गया था।
इसके अलावा, कंपनी ने उपार्जन का लाभ दिलाने के लिए जिन तथाकथित किसानों की लंबी-चौड़ी सूची कृषि विभाग को सौंपी थी, उसमें न तो किसी किसान का स्थाई पता दर्ज था और न ही उनके शेयर होल्डिंग की कोई प्रामाणिक जानकारी दी गई थी। जांच दल के अधिकारियों ने जब 7 अप्रैल 2026 को उस सूची में दिए गए रैंडम मोबाइल नंबरों पर सीधे कॉल करके बात की, तो फोन उठाने वाले ग्रामीण नागरिकों ने इस कंपनी का सदस्य होने या इसके साथ किसी भी तरह के लेन-देन से साफ तौर पर इनकार कर दिया, जिससे इस पूरे घोटाले की पोल खुल गई।
कमीशन और हैंडलिंग चार्जेस के नाम पर निकाली सरकारी राशि
मध्य प्रदेश राज्य सहकारी विपणन संघ मर्यादित (मार्कफेड) जबलपुर क्षेत्रीय कार्यालय की ऑडिट रिपोर्ट से इस पूरे संगठित वित्तीय गबन के वास्तविक आंकड़ों की पुष्टि हुई है। कंपनी के मुख्य डायरेक्टर संदीप दुबे, उनके अन्य साथी पदाधिकारियों और कर्मचारियों ने सोची-समझी साजिश के तहत प्रासंगिक व्यय (एक्सपेंसेस), अनाज की हैंडलिंग और सरकारी कमीशन के नाम पर कुल 39,67,781 रुपये की मोटी धनराशि फर्जी बिलों और जाली दस्तावेजों के सहारे सीधे अपने नियंत्रण वाले खातों में ट्रांसफर करवा ली।
यह पूरी धनराशि सरकारी खजाने को सीधे तौर पर आर्थिक क्षति पहुंचाकर अवैध रूप से हड़पी गई थी। मामला पूरी तरह उजागर होने के बाद कृषि विभाग के आला अधिकारियों ने पाटन थाने पहुंचकर कानूनी कार्रवाई के लिए लिखित आवेदन दिया, जिस पर कार्यवाहक प्रधान आरक्षक राममिलन रजक ने विधिवत जीरो पर कायमी करते हुए मुख्य केस डायरी तैयार की। इस बड़ी कार्रवाई के बाद भोपाल स्थित सहकारिता विभाग और जबलपुर के व्यापारिक हलकों में हड़कंप मच गया है।


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